किसी भी उम्र में हो सकती स्किज़ोफ्रेनिया की समस्या, जानें इसके लक्षण और बचाव


किसी भी उम्र में हो सकती स्किज़ोफ्रेनिया की समस्या, जानें इसके लक्षण और बचाव

शुरुआती दौर में लोग स्किज़ोफ्रेनिया के लक्षणों को पहचान नहीं पाते और यह मनोरोग गंभीर रूप धारण कर लेता है। क्यों होती है यह समस्या और इससे कैसे करें बचाव जानेंगे इसके बारे में…

जब कभी जटिल किस्म के मनोरोगों की चर्चा होती है तो सबसे पहले स्किज़ोफ्रेनिया का नाम लिया जाता है। इस साइकोटिक डिसॉर्डर की श्रेणी में रखा जाता है। यह मानसिक बीमारी किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकती है। इस समस्या से ग्रस्त व्यक्ति अपना नाम-पता बताने में असमर्थ होता है। उसे वर्तमान समय, स्थान और अपने अस्तित्व का भी एहसास नहीं होता। वह खाद्य और अखाद्य पदार्थों के बीच अंतर पहचानने में भी असमर्थ होता है। मनोविज्ञान की भाषा में ऐसी अवस्था को लॉस ऑफ ओरिएंटेशन कहा जाता है।   

स्किज़ोफ्रेनिया के प्रकार

चाइल्डवुड स्किज़ोफ्रेनिया: बच्चों में होने वाली समस्या।

कैपेटोनिक: इसमें दो तरह की अवस्थाएं हो सकती हैं-पहली अवस्था में मरीज़ उग्र और हिंसक हो जाता है। दूसरी अवस्था में वह घंटों एक ही मुद्रा में स्थिर रहता है, जिससे उसकी मांसपेशियां अकड़ जाती हैं। इस अवस्था को स्टूपर कहा जाता है। 

पैरानॉयड: मरीज़ के मन में हमेशा इस बात का शक बना रहता है कि कोई उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। 

स्किज़ो-एफेक्टिव: मरीज़ को कई तरह के भ्रम होते हैं और उसमें मूड डिसॉर्डर जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं। ऐसे में कभी वह गहरी उदासी में निष्क्रय पड़ा रहता है तो कभी अचानक अति उत्साहित हो जाता है। 

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1. व्यक्ति लोगों से दूर बिलकुल अकेले रहना और खुद से बातें करना पसंद करता है, ऐसी मानसिक अवस्था को विड्रॉअल सिंड्रोम कहा जाता है।

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2. रोज़मर्रा से जुड़े मामूली कार्य करने में  दिक्कत और अनिद्रा की समस्या भी होती है। 

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3. वास्तविक दुनिया से संपर्क खत्म होना और अपने भीतर अलौकिक शक्तियों का एहसास होना।

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4. मरीज़ हमेशा विभ्रम की स्थिति में रहता है। सामने कुछ भी नहीं होता, फिर भी उसे ऐसी आवाज़ें सुनाई देती हैं या ऐसे सजीव दृश्य दिखाई देते हैं, मानो सारी घटनाएं उसकी आंखों के सामने ही घटित हो रही हों।

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5. व्यवहार हिंसक और आक्रामक हो जाता है। अपनी भावनाओं और विचारों पर मरीज़ का कोई नियंत्रण नहीं रहता। ऐसे में वह स्वयं को या सामने मौज़ूद व्यक्ति को भी नुकसान पहुंचा सकता है।

क्या है वजह

आनुवंशिकता, परिवार का अति नकारात्मक माहौल, घर या ऑफिस से जुड़े किसी गहरे तनाव के कारण यह मनोरोग हो सकता है। शरीर में मौज़ूद केमिकल्स में बदलाव या असंतुलन की वज़ह से व्यक्ति इस समस्या का शिकार हो सकता है। बच्चों या टीनएजर्स को भी यह समस्या हो जाती है।

जांच एवं उपचार

सबसे पहले मरीज़ के परिवार वालों से लक्षणों के बारे में पूछा जाता है। फिर साइको-डायग्नॉस्टिक टेस्ट किया जाता है, जिससे यह मालूम हो जाता है कि व्यक्ति को किस प्रकार का स्किज़ोफ्रेनिया है। यह जांच हमेशा किसी प्रशिक्षित क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से करवानी चाहिए।

इसके उपचार के दौरान मनोचिकित्सक द्वारा एंटी-साइकोटिक मेडिकेशन दिया जाता है और साइको थेरेपी की ज़रूरत पड़ती है। गंभीर स्थिति में ईसीटी यानी इलेक्ट्रो कन्वल्सिव थेरेपी की भी मदद ली जाती है। कई बार घर पर ऐसे मरीज़ों की देखभाल मुश्किल होती है, इसलिए इन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है। फैमिली काउंसलिंग और साइको थेरेपी की भी मदद ली जाती है ताकि परिवार के सदस्य मरीज़ को सही ढंग से मैनेज कर पाएं। उपचार के बाद नियमित फॉलोअप ज़रूरी है। मरीज़ के खानपान का ध्यान रखते हुए उसे संतुलित और पौष्टिक आहार देना चाहिए।

 डॉ.जयंती दत्ता (क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट)

 

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